मानवीय आधार पर मनुष्य सुख और दुख नामक दो पहियों पर सदैव सवार है मनुष्य के समस्त कार्य सुख-दुख पर आश्रित होते हैं , व्यक्ति वही कार्य करता है या वही वस्तु ग्रहण करता है जिससे सुख की प्राप्ति हो, और वह कार्य नहीं करता जिससे उसे दुख मिलने की संभावना अर्थात जीवन में उपयोगी ना हो । लोग दुख से दूर ही रहते हैं मानव के समस्त कार्यों के उपयोग से निर्धारित होता है वही धर्म- अधर्म, न्याय- अन्याय भलाई-बुराई , लाभ हानि,सभी उपभोग द्वारा ही होती है। परंतु सुख में अगर छोटा "उ" है तो सुख या आनंद है,यह मन में उत्तेजना को जन्म देता है मनुष्य एक भोग विलासी प्राणी है, जो कभी सुख से संतुष्ट नहीं हो सकता।एक पैदल चलने वाला, साइकिल की कल्पना करता है , साइकिल वाला मोटरसाइकिल की, मोटरसाइकिल वाला कार की, कार वाला हवाई जहाज,हवाई जहाज वाला चंद्रमा पर घर बनाने का सुख आनंद चाहता है।परंतु यह संतुष्ट ना होने वाला नशा है। जबकी सूख में बड़ा "ऊं" एक ऐसा विषय है जो किसी गिले वस्तु आदि को सुखाने में या सूखने के बाद पूर्ण मान लिया जाता है । ठीक उसके विपरीत दुख दुख मनुष्य की एक पीड़ा या दर्द है जिसे परेशानी कहा जा सकता है और यह अनुभव करने की वस्तु है। दुख में छोटा "उ" हो या बड़ा "ऊं" हो वह दूख ही होता है चाहे काटा चुभने का दर्द हो या अपने माता-पिता के खोने का गम क्योंकि दुख से व्यक्ति की शारीरिक शक्ति क्षीण होती है और असहाय या निराशा महसूस करने लगता है दुख भावनात्मक आधार पर महसूस करने वाली स्वभाविक घटना है । जिससे व्यक्ति के मन को आघात पहुंचता है। अर्थात सदैव मनुष्य सुख की ओर आकर्षित होता है और सुख प्राप्त करने वाली वस्तु को हासिल करने में ध्यान केंद्रित रखता है। और दुख को त्यागने का प्रयास करता है परंतु मानवीय जीवन के आधार पर सुख प्राप्ति एवं दुख निवारण ही जीवन का सार है।
विनोद झावरे
वामला, छिन्दवाड़ा
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