मेरी
अपनी राय है कि शिक्षा नीति को और प्रभावी बनाने के लिए सामान्य शिक्षा की
व्यवस्था लागू हो। गुणवत्ता के स्तर पर सभी को एक जैसी शिक्षा उपलब्ध कराया जाए।
कोठारी आयोग ने भी इस पर काफी बल दिया था। वर्तमान शिक्षा का परिवेश देखे तो
केंद्रिय कर्मचारियों के बच्चों के लिए केंद्रीय विद्यालय हैं, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक
स्कूल हैं, गांव में जो मेरिट वाले बच्चे हैं उनके लिए नवोदय
स्कूल हैं, साधन संपन्न अपने बच्चों को प्राइवेट में पढ़ते है, और सामान्य बच्चों के लिए सरकारी
स्कूल ही एकमात्र विकल्प बचता है । इससे एक तरह की असमानता हम लोगों ने ही पैदा कर
दी है। समाज का एक विशेष आर्थिक पहुँच वाला व्यक्ति ही अपने बच्चों को यह शिक्षा
दे पा रहा है और बाकी के लिए सरकारी पाठशालाएं हैं। हम अच्छे स्कूलों को ख़त्म न
करें पर आम लोगों के लिए उपलब्ध शिक्षा व्यवस्था में अध्यापक से लेकर सामग्री तक
सुधार तो लाएं ताकि ग़रीब तबका और दलित समाज के बच्चे औरों के सामने खड़े तो हो
सकें ।
पिछड़े समुदाय जैसे आदिवासी, दलित, महिलाएं, अल्पसंख्यक और फिर ग़रीब व्यक्ति, इन सभी को शिक्षा में समान अधिकार दिए जाने की ज़रूरत है। जिन दलित
की स्थिति सुधरी है उन्हें भी शिक्षा में समान अधिकार तो मिलने चाहिए पर आर्थिक
सहूलियतें उन्हें ही देनी चाहिए जो कि ग़रीब हैं।
आज
किसी भी क्षेत्र में बच्चों का चयन एवं प्रवेश का एक ट्रेंड देखा जा सकता है कि
उनका इंट्रेंस परीक्षा होती है एवं प्रवीण सूचि में जिनका स्थान ऊपर है उनका चयन
शिक्षा, रोजगार,
प्रशिक्षण या किसी भी लाभान्वित योजनाओं का लाभ पाने वाले स्थान पर
चयन होता है । यह एक बहुत ही पुरानी एवं प्रचलित पद्धति है । परन्तु मेरे मन में
एक प्रश्न हमेशा उमड़ता रहता है कि उन बच्चों का क्या जो मेरिट सूचि में नहीं आये
है? वैसे यदि थोडा गंभीरता से इन सुचिओं में आगे आने वालों
की प्रष्ठभूमि देखा जाए तो पता चलेगा कि यह सभी ऐसे वर्गों से होंगे जो आर्थिक रूप
से सक्षम, प्राइवेट स्कूल में शिक्षित, कोचिंग लेने वाले, अंग्रेजी मीडियम वाले, सामाजिक रूप से प्रभावी एवं उच्च जातिगत सक्षमता से पूर्ण साधन संपन्न
लोगो के बच्चे होंगे। हमारे 80 प्रतिशत बच्चे जो इन मेरिट सूचि से बंचित रह गए है
सही मायने में उन पर ही अधिक कार्य करने की आवश्यता है। ये बच्चे अपने आर्थिक,
सामाजिक, राजनैतिक एवं सांकृतिक पिछड़ेपन के कारण मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाते है एवं हर क्षेत्र में पिछड़
जाते है । मजबूरन उन्हें हालातो से समझौता करके जो मिला उससे ही संतुष्ट होना पड़ता
है एवं उच्च शिक्षा, उच्च पद , रोजगार
आदि से समझौता करना पड़ता है। हमारी सरकारे या
शिक्षा सुधार में कार्य करने वाले संस्थानों को ऐसे बच्चो के शिक्षा के लिए उचित
प्रयास करने की आवश्यता है ।
“हर एक बच्चा के पास अपना एक विशिष्ट गुण होता है, इसे पहचानकर उसे उस दिखा में
प्रखर बनाने के लिए सहयोग करने की आवश्यता है।”
जो
बच्चे परीक्षा में सफल नहीं होते वे कुछ नहीं कर सकते यह धरना से थोडा ऊपर उठकर
सोचना होगा और उन्हें उनके रुचिकर क्षेत्र के अनुसार माहौल देकर आगे बढ़ाने की
आवश्यता है। इतिहास गवाह है बिजली बल्व के अविष्कारक महान वैज्ञानिक थॉमस
एल्वा एडिसन बचपन में इतने मंदबुद्धि थे कि उन्हें स्कूल से
निकाल दिया गया था । दुनिया के सबसे बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक अल्बर्ट आइंस्टीन को बचपन
में मंद बुद्धि बालक माना गया था। उनके शिक्षक ने उन्हें पढाई छोड़ने की सलाह दी थी
और कह दिया था । काफी बड़ी उम्र तक बोलना एवं लिखना न सिख पाने वाले इस व्यक्ति को दुनिया का सबसे महान वैज्ञानिक माना गया और इन्होने भौतिकशास्त्र में नोबेल प्राइज जीता ।
लेखक
श्याम कुमार कोलारे

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