छिन्दवाड़ा- कहते हैं कि नींव जितनी मजबूत होगी, इमारत उतनी ही बुलंद होगी। नींव से इमारत बनने की इस प्रक्रिया में कई तत्व सहायक की भूमिका अदा करते हैं स शिक्षा किसी भी देश के लिये उसकी विरासत, उसकी राष्ट्रीय शिक्षा यानि महज़ पढ़ना-लिखना/साक्षर होना भर नहीं हैं अपितु यह व्यक्ति के लिये बौध्दिक विकास के सुअवसर प्रदान करने का एक माध्यम है। शिक्षा का अभिप्राय यह नहीं कि मनुष्य उन वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करे जो जिनका उसे ज्ञान नहीं है अपितु उसका अभिप्राय है, उसको वैसा व्यवहार करने की शिक्षा देना, जैसा कि वह नहीं करता। वर्तमान में शिक्षा का जो रूप देखने को मिल रहा है वह बहुत ही चिंताजनक है। हाल ही में प्रथम संस्था द्वारा जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट असर 2018 (एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट)” ने ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा और बुनियादी शिक्षण पर केन्द्रित वार्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत की है। मध्यप्रदेश में असर 2018 की पहुंच 50 जिलों के 1500 गांवों तक रही तथा इसमें करीब 30,000 परिवारों के 3-16 आयुवर्ग के 48,881 बच्चों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया था।
जिले के रेंडमली 30 गाँव को सर्वेक्षण में शामिल किया गया था। जिसमे 3-16 आयुवर्ग के बच्चो का सर्वेक्षण शामिल किया गया था। 5-16 वर्ष के बच्चो से बुनियादी हिन्दी, गणित में दक्षता के बारे में जाना गया था। रिपोर्ट में बताया गया है कि छिन्दवाड़ा जिले के कक्षा आठवी के 30 फीसदी दूसरी कक्षा का पाठ बच्चे नहीं पढ़ पाते है । जिला में पिछले कुछ वर्षों की तुलना में पढ़ने के स्तर में गिरावट आई है,कक्षा 3-5 में कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ लेने वाले बच्चों की संख्या 2016 में 56.9 प्रतिशत थी जो वर्ष 2018 में घटकर 50.7 प्रतिशत हो गई है स वर्ष 2018 में माध्यमिक स्कूल (कक्षा 6-8) के 70 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ पा रहे है। कहा जाये तो अभी भी 30 प्रतिशत बच्चे को अपनी कक्षा के 6 साल पहले की कक्षा का पाठ नहीं पढ़ पा रहे है और बगैर पढ़ने की बुनियादी दक्षता हासिल किये अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण किये जा रहे है। ये एक चैथाई से ज्यादा बच्चे अपनी उच्च शिक्षा के लिए क्या मानसिक रूप से तैयार है यह प्रश्न सभी को मुह चिड़ा रहा है। इसके लिए सभी जिम्मेदारो को सजकता से कार्य करने की आवश्यकता है। तभी कुछ अच्छे परिणामो की आपेक्षा की जा सकती है।
गणित अभी भी बनी हुई है समस्या: जिला में प्रारंभिक गणित सम्बंधी आकड़ों में पिछले वर्षों की तुलना में अल्प ही सुधार दिखाई देता है। वर्ष 2016 में कक्षा 3-5 के 33.9 प्रतिशत बच्चे दो अंकों का घटाव के सवाल हल कर पा रहे थे वही वर्ष 2018 में यह संख्या थोड़ी बढ़कर 36.9 प्रतिशत हो गई है। माध्यमिक स्कूलों की में गणित की स्थिति अभी भी निराशा का कारण बनी हुई है। कक्षा 6-8 के मात्र 35.4 प्रतिशत बच्चे ही साधारण भाग के सवाल कर पाते है । यही स्थिति बनी रही तो आगामी पीढ़ि का भविष्य अन्धकारमय में जाते दिखाई दे रहा है।
शिक्षक और छात्र उपस्थिति: प्रदेश में छात्रों की उपस्थिति अभी भी चिंता जनक है। पिछले कई वर्षों के दौरान प्राथमिक व उच्च प्राथमिक दोनों तरह के विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति में गिरावट दिखाई देती है। वर्ष 2010 में प्राथमिक विद्यालयों में 65.9 प्रतिषत छात्रों की उपस्थिति की तुलना में वर्ष 2018 में 57.1 प्रतिषत उपस्थिति दर्ज की गई है। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में यह प्रतिशत 2010 में 67.6 प्रतिषत की तुलना में 53.4 प्रतिषत दर्ज की गई है। शिक्षकों की उपस्थिति प्राथमिक व उच्च प्राथमिक दोनों तरह के विद्यालयों में औसतन 85 प्रतिषत रही है।
स्कूली सुविधाओं में लगातार बढ़ोत्तरी दिखाई देती है: शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE एक्ट) 2010 में लागू हुआ और इस कानून के प्रावधानों का लाभ लेने वाले विद्यार्थियों के पहले बैच ने अनिवार्य स्कूली शिक्षा के 8 वर्ष 2018 में पूरे कर लिए हैं। इस कानून के तहत मिलने वाली सुविधाओं की उपलब्धता के लिहाज से प्रदेश में पिछले आठ वर्षों के दौरान हुए उल्लेखनीय सुधार सर्वत्र देखे जा सकते हैं। लड़कियों के शौचालय उपलब्ध होने वाले स्कूलों का आंकड़ा दो गुना इजाफे के साथ 2018 में 56.5 प्रतिषत पर पहुंच गया । चारदीवारी वाले स्कूल बढ़ोतरी के साथ 2018 में 70.2 प्रतिषत पर पहुंच गए। पाठ्यपुस्तकों से अन्य पुस्तकों की उपलब्धता वाले स्कूलों का आंकड़ा भी इसी दौरान 56.3 प्रतिषत से बढ़कर 84 प्रतिषत पहुँच गया है जो राष्ट्रीय औसत 74.2 प्रतिशत को पार कर गया है।
श्याम कुमार कोलारे
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