भारी बस्तों का बोझ उठाता बचपन
बस्तों के बढ़े बोझ से नौनिहालों को दोहरा नुकसान झेलना पड़ रहा है। एक तो बच्चों पर पढ़ाई का अतिरिक्त बोझ बढ़ा और जो व्यावहारिक ज्ञान बच्चों को विद्यालयों में मिलना चाहिए था, उसका दायरा लगातार सिमटता गया। बस्तों के बढ़े बोझ तले बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। आज बच्चे अपने बचपन को ढूंढ रहे हैं। किताबों से भरे बस्ते बेचारे मासूम बच्चे अपने कंधों पर ढो रहे हैं। हंसने-खेलने की उम्र में बच्चों की पीठ पर किताबों, कापियों का इतना बोझ लादना क्या इन मासूमों पर अत्याचार नहीं है। लगभग पांच दशक पहले पहली से पांचवीं कक्षा के विद्यार्थियों पर इतना बोझ नहीं था। मसलन पहली कक्षा के लिए एक किताब और दूसरी के लिए दो और तीसरी के लिए तीन और चौथी, पांचवीं के लिए चार किताबें और कापियां होती थीं। इतना ही नहीं, हर कक्षा के लिए स्तर के हिसाब से पहाड़े तथा गणित के प्रश्न होते थे। इसके साथ-साथ व्यवहार गणित, लाभ-हानि, ब्याज व समीकरण के प्रश्न होते थे, लेकिन आज पाठ्यक्रम में व्यावहारिक पाठ्यक्रम के ज्ञान व शिक्षा से भी बच्चों को वंचित होना पड़ रहा है। इससे हमें दोहरा नुकसान झेलना पड़ रहा है। एक तो बच्चों पर बोझ बढ़ा और दूसरा जो व्यावहारिक ज्ञान बच्चों को विद्यालयों में मिलना चाहिए था, उसका दायरा लगातार सिमटता गया। कहना न होगा कि बस्तों के बढ़े बोझ तले बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास सही ढंग से नहीं हो पा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 12 साल की आयु के बच्चों को भारी स्कूली बस्तों की वजह से पीठ दर्द का खतरा पैदा हो गया है। पहली कक्षा में ही बच्चों को छह पाठ्य पुस्तकें व छह नोट बुक्स दी जाती हैं। मतलब पांचवीं कक्षा तक के बस्तों का बोझ करीब आठ किलो हो जाता है। प्रदेश के बच्चों के बस्ते और भारी भरकम हैं। इससे बच्चों को पीठ, घुटने व रीढ़ पर असर पड़ रहा है। आजकल बहुत सारे बच्चे इसके शिकार हो रहे हैं। इसलिए बच्चों को भारी बोझ न उठाने दें। उधर, विशेषज्ञों के अनुसार छोटी उम्र में भारी बोझ उठाने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर रोक लग जाती है। बस्तों के बढ़े बोझ से प्रदेश के निजी स्कूलों के बच्चे खेलना भी भूल रहे हैं। घर से भारी स्कूल बैग का बोझ और स्कूल से होम वर्क की अधिकता से शिशु दिमाग का विकास बाधित हो रहा है।
कान्वेंट स्कूलों में छोटी कक्षा के मासूमों व दसवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बराबर होमवर्क दिया जा रहा है जिससे देर रात्रि तक इन छात्रों को सिर उठाने की फुर्सत नहीं होती, खेलना किसने देखा। बच्चे स्कूल से घर आकर न तो कुछ वक्त फुर्सत के निकाल पाते हैं और न ही खेलों के लिए उचित समय मिल पा रहा है। बढ़ी स्पर्धा के दौर में सरकारी स्कूलों को छोड़कर अभिभावक अपने नौनिहालों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। सर्व शिक्षा अभियान ने इस दिशा में प्रयास किए, परंतु उनके अनुपालन का कार्य केवल सैद्धांतिक स्तर तक सीमित रहा, इसको व्यावहारिक रूप नहीं मिल पाया। हमें कुछ ऐसे उपाय सोचने चाहिए, जिससे ये मासूम बस्ते के बोझ से मुक्त हो सकें और उनका स्वाभाविक विकास हो। इसलिए आवश्यक है। निश्चय ही कुछ स्वार्थी तत्त्व इन महकते पुष्पों पर भी अत्याचार करने से बाज नहीं आते। उनका उद्देश्य हर कक्षा में अधिक से अधिक पुस्तकें लगवाना रहता है, जिससे वे पुस्तक विक्रेताओं और दुकानदारों से कमीशन लेकर अपनी जेब गर्म कर सकें। दूसरी बात जो ध्यान में देनी है, वह यह है कि कक्षा के बंद कमरे में पाठ रटवाने के स्थान पर उन्हें रोचक ढंग से पढ़ाया जाए। विद्यालयों में दी जा रही शिक्षा पुस्तकों के भार से दबी है। इस बोझ को कम करने की काफी चर्चा और सुझाव आते रहे, परंतु वे क्रियात्मक रूप से कुछ अधिक सफल नहीं हो पाए। बच्चों के दिमाग में शब्दों को भरना नहीं चाहिए, बल्कि उनके मस्तिष्क में शब्दों को निकलवाना चाहिए। वे अच्छी तरह से शब्दों को समझें, रटें नहीं। बच्चों को व्यावहारिक विद्या सिखलाई जानी चाहिए, ताकि उनके विचार शक्ति में इजाफा हो।

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