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सरकारी शिक्षा का स्याह सच

सरकारी शिक्षा का स्याह सच

- सुनील तिवारी
4सर्वशिक्षा अभियान और फिर शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर में सुधार के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। इसकी पुष्टि हर वर्ष शिक्षा के स्तर की देशव्यापी पड़ताल करने वाली गैर सरकारी एजेंसी असर (एनुअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट) की वर्ष 2014 की ताजा रिपोर्ट करती है। इस रिपोर्ट  में बताया गया है कि सरकारी स्कूलों में पढने वाले पांचवीं स्तर  के केवल 48़1 फीसदी विद्यार्थी और आठवीं स्तर के केवल 75 फीसदी विद्यार्थी ही कक्षा दो की किताबें पढ़ पाते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से स्कूली बच्चों के नामांकन में खासा वृद्धि हुई है परन्तु   सरकारी स्कूलों की तुलना में प्राइवेट स्कूलोें में बच्चों का नामांकन लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2013 में जहां 49 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे थे। वहीं 2014 में इनकी संख्या बढ़ कर 51़7 फीसदी हो गई है।
हिन्दी क्षेत्रों से जुड़े स्कूलों की स्थिति तो और भी अधिक चिन्ताजनक है। उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड जैसे राज्यों में निजी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या में 35 से 40 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। यदि दक्षिण के कुछ राज्योें को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी राज्यों में सरकारी स्कूलों की दशा निराशाजनक है। ग्रामीण क्षेत्रों के भी अभिभावक सरकारी की जगह निजी स्कूलों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हंै क्योंकि उनका मानना है कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है। इस बदहाली के लिए सरकारी नियम और कानून ही जिम्मेदार हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार में जिस प्रकार अध्यापकोें की भर्ती की गई है और उसमें स्थानीय जोड़ तोड़ हुआ है, उससे वे अच्छे लोग किनारे कर दिए गए, जो अपने ज्ञान और समझ के जरिए स्कूली शिक्षा में सार्थक हस्तक्षेप कर सकते थे। शिक्षा मित्र योजना के तहत भर्ती का अधिकार जबसे पंचायतों के हवाले किया गया है, उसमें सिर्फ और सिर्फ जोड़-तोड़ को ही बढ़ावा मिला है। पंचायतों ने योग्यता के मानदंड के बजाय अपने गु्रप और रिश्वत को ज्यादा महत्व दिया है। उत्तर भारत के राज्यों में पंचायती राज व्यवस्था में नागालैंड की तरह परिपक्वता नहीं आ पाई है, जहां पंचायती राज्य बेहतर शिक्षा को भावी पीढ़ी के लिए जरूरी मानती है तथा बेहतर शिक्षक की नियुक्ति एवं पढ़ाने की शैली के साथ  अनुशासन पर भी जोर देती है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से नागालैण्ड में निजी स्कूलो के भी बच्चे सरकारी स्कूलों की तरफ आ रहे हैं, लेकिन उत्तर भारत में हालात बिल्कुल उलट है।
उत्तर भारत के सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत की वजह भर्ती की प्रकिया और स्कूली शिक्षा पर पंचायतों का प्रभुत्व को माना जाता है। केन्द्र सरकार ने स्कूली शिक्षा की बदतर स्थिति को देखते हुये राज्य सरकारों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और उन्हें कड़े मानदंड अपनाने की हिदायत दी, लेकिन हकीकत तो यह है कि वर्तमान में जिस तरह से निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है उससे सरकारी शिक्षा व्यवस्था को किनारे होना ही है। सरकारी शिक्षा को लेकर आमजन के मन में जो छवि बनी हुयी है, उससे कोई भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहता और जो भेजते भी हैं वे ट्यूशन का सहारा ले रहे हैं। भारत देश उदारीकरण का एक दौर पूरा कर चुका है और अब इसमें आगे बढ़ने के गुंजाइश तभी होगी, जब हम ज्ञान और समझ आधारित समाज की तरफ आगे बढेÞंगे।
अगर स्कूली शिक्षा का आधार यही बना रहा तो यह निश्चित ही संभव नहीं होगा। यह किसी हद तक सही है कि शिक्षा के ढांचे को सुधारने की जिम्मेदारी राज्यों की ही है परन्तु देखने में आया है कि शिक्षा के अधिकार कानून के प्रभावी होने के तकरीबन 3 से अधिक साल बाद भी राज्य सरकारें गंभीर नहीं है। राज्यों में शिक्षकों के पद आज भी रिक्त पडेÞ हैं। ऐसी परिस्थितियों में देश की प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता का अनुमान स्वत: ही लगाया जा सकता है।
देश में प्राथामिक शिक्षा की बढ़ी मांग के अनुरूप अनुमानित बजट का जो प्रावधान किया जाता है वह निश्चित ही इतना कम होता है कि राज्य सरकारें सदैव ही बजट की कमी बताते हुए अल्प वेतन अथवा ठेके पर शिक्षा कर्मियों की भर्ती करके प्राथमिक शिक्षण की खानापूर्ति करती हैं। देश की आजादी के बाद राष्टीÑय विकास के लिए जिस विदेशी मॉडल का अनुकरण किया गया, उसने हमारी मातृभाषा से जुड़ी प्राथमिक शिक्षा की पृष्ठभूमि को गर्त में धकेल दिया। आज मैकाले शिक्षा पद्धति से जुड़ी अग्रेजी शिक्षा आत्मसम्मान का साधन बन गई। पहले तो राज्यों में केवल सरकारी स्कूल ही हुआ करते थे और उनमें निकले बच्चे प्रत्येक क्षेत्रों में सफलता का परचम लहराते थे।
यह कहना गलत होगा कि पढ़ाई का स्तर केवल प्राइवेट स्कूलों में ही रह गया है, सरकारी स्कूल नकारा हो गए हैं। देश में शिक्षा की सूरत में सुधार के लिए जितनी भी कवायदें की गर्इं, उनमें सबसे ज्यादा जोर दाखिलों पर दिया गया। इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि माध्याह्न भोजन, यूनिफार्म, साइकिल, छात्रवृत्ति के लालच से सरकारी स्कूलों में प्रवेश बढ़े हैं। यहां सवाल यह उठता है कि क्या प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य मात्र स्कूलों में प्रवेश वृद्धि तक ही सीमित रहना चाहिए? देश की प्राथमिक शिक्षा में योग्य व प्रतिबद्ध शिक्षकों और इसके बुनयादी तंत्र को श्रेष्ठता के आधार पर विकसित करने की जरूरत है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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