शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार को लेकर जो घमासान मचा है, आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर
को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहस होती है। और
अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का
उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व
सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है,
तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के
साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना से
लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी
तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य
और अयोग्य कैसे हो सकता है? हालांकि काफी हद तक यह बात सही है कि
स्कूलों में कुछ शिक्षक पढ़ाते नहीं हैं। स्कूल वक्त पर पहुँचते नहीं हैं। शिक्षक
वैसा शिक्षण नहीं करते जो गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की श्रेणी में आता है। आये दिन
किसी मुद्दे को लेकर हड़ताल पर चले जाना और स्कूलों की छुट्टी हो जाना आम हो गया
है। शिक्षार्थी शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालय जाते हैं, लेकिन वहां शिक्षक ही नदारद रहते हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता पर
प्रश्न लगना लाजिमी है।
प्रथम
एजुकेशन फाउंडेशन द्वारा जारी (एनुअल
स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट 2017) असर रिपोर्ट के आकडे के अनुसार देश शिक्षा की हालत वेहद ही नाजुक बनी
हुई है l नवम्बर माह में भोपाल (ग्रामीण) के 60 गाँव में 952
घरों के 14-18 आयु वर्ग के 1244
युवाओं के सर्वे पर आधारित असर रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश की
राजधानी भोपाल (ग्रामीण) में 14-18 आयु वर्ग के 69%
युवा औपचारिक शिक्षा प्रणाली के
अंतर्गत स्कूल या कॉलेज में नामांकित हैं। 31% युवा अभी भी शिक्षा
में नामांकन से दूर हैं । शिक्षा प्रणाली में लड़के और लड़कियों के नामांकन में अंतर
आयु के साथ बढ़ता जाता है। 17-18
वर्ष की आयु में भोपाल में 33% लड़कों की तुलना में
48% लड़कियाँ नामांकित नहीं हैं। कुल मिलाकर, भोपाल
में केवल
3% युवा ही वोकेशनल कोर्स (किसी भी प्रकार का) कर रहे हैं। 14-18 आयु वर्ग
के युवाओं का 44% एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई के साथ परिवार के
आर्थिक नियोजन में सहयोग करते है l
पिछले 12 वर्षों से, असर के आंकड़े निरंतर इस बात
की ओर इशारा करते आए हैं कि प्रारम्भिक स्कूलों में बहुत से बच्चों को पढ़ने और सरल
गणित करने जैसी बुनियादी क्षमताएँ प्राप्त करने के लिए तुरंत सहयोग की आवश्यकता
है। इस वर्ष 14-18 आयु वर्ग के युवाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है, इसलिए युवाओं की बुनियादी क्षमताओं
के साथ-साथ उनकी “बियॉन्ड बेसिक्स”, अर्थात बुनियादी क्षमताओं से आगे के
कार्यों को करने की क्षमता को भी समझना आवश्यक है। 14-18 आयु वर्ग के युवाओं की
बुनियादी क्षमताओं की वर्तमान स्थिति का आँकड़ा 37% युवा अभी भी
अपनी भाषा में एक सरल पाठ को धाराप्रवाह रूप से नहीं पढ़ सकते। आधे से ज़्यादा
(लगभग 67%) युवा भाग का सवाल (तीन अंकों वाली संख्या का एक
अंक) से नहीं कर सकते l 40% युवा ही अंग्रेज़ी के सरल वाक्य
पढ़ सकते हैं । युवाओं ने प्रारम्भिक शिक्षा के 8 वर्ष पूरे तो क्र लिए हैं, परन्तु एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिनमें अभी भी बुनियादी क्षमताओं - जैसे
पढ़ना एवं सरल गणित करना की कमी है । हांलाकि, क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेज़ी में
पढ़ने की योग्यता में आयु के साथ सुधार नज़र आता है (14 वर्ष के युवाओं की तुलना में
18 वर्ष के अधिक युवा पढ़ सकते हैं) किन्तु गणित में ऐसा नहीं देखा गया है।
बुनियादी गणित करने की क्षमता में असमर्थ 14 वर्ष के युवाओं का प्रतिशत, 18 वर्ष के युवाओं के बराबर ही है। प्रारम्भिक स्तर पर सीखने के आभाव का
असर आगे भी नज़र आता है, जब युवा किशोरावस्था से वयस्कता में प्रवेश करते हैं। इस
आयु वर्ग में सभी से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे कई दैनिक कार्य करने में सक्षम
हों, जिनमें बुनियादी पढ़ने और गणित करने की क्षमता की आवश्यकता होती है। एनुअल
स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) 2017 ने
14-18 आयु वर्ग के युवाओं की कुछ ऐसे कार्य करने की क्षमताओं को समझने का प्रयास
किया है। दैनिक कार्यों में कुछ सरल गतिविधियों का चयन किया जैसे पैसे गिनना, वज़न
जोड़ना और समय बताना शामिल किया गया है l
भोपाल ग्रामीण के 63% युवा ही रुपयों
की सही गिनती कर पाए । आधे से कम फीसदी युवा किलोग्राम में सही वजन जोड़कर नहीं बता
सके । समय बताना एक सामान्य दैनिक कार्य है । 78% युवाओं ने सरल
प्रश्न (केवल घंटे बताना) का सही उत्तर दिया। किन्तु थोड़े से कठिन प्रश्न (घंटे और
मिनट दोनों बताना) का सही उत्तर में केवल
50% युवा ही दे सके । क्या युवा ऐसी सामान्य गणनाएँ कर सकते हैं जिनकी आम-तौर
पर ज़रुरत पड़ती है? असर 2017 के
लिए असर ने कुछ ऐसी गतिविधियों का चयन किया - जैसे रूलर की सहायता से लम्बाई
मापना, समय की गणना करना, एकाकिक विधि का इस्तेमाल करना (उदाहरण के लिए, यह निर्णय लेना कि पानी को स्वच्छ
करने के लिए क्लोरीन की कितनी गोलियों की आवश्यकता है)। भोपाल के 84% युवाओं ने दी गई वस्तु की लम्बाई सही नाप बता पाए, जब वह वस्तु रूलर पर
‘0’ के निशान पर रखी थी। मगर जब वह वस्तु
रूलर पर किसी और जगह रखी थी तो केवल 25% ही सही जवाब दे
पाए। भूगोल और सामान्य ज्ञान की कितनी जानकारी है आधारित प्रश्नों में सर्वेक्षित
युवा को भारत का नक़्शा दिखाया गया। फिर उनसे कई प्रश्न पूछे गए l देश का नक्शा है 81% युवा ही पहचान पायें । देश की राजधानी का नाम 65%
युवा ही सही बता पाए l 63% युवाओं ने ही बताया की वह
मध्यप्रदेश राज्य में रहते हैं l और मात्र 40% युवा ही नक़्शे पर अपने राज्य को
दिखा सके ।
कुल मिलाकर, यह बात सामने आती है कि बुनियादी
क्षमताएँ जैसे पढ़ना और गणित करना दैनिक कार्य और सामान्य गणनाएँ करने में सहयोगी
हैं। हांलाकि, सभी ऐसे युवा जो पढ़ना एवं बुनियादी गणित करना जानते हैं, इन दैनिक
कार्यों को सही तरीके से पूरा नहीं कर पाते हैं। उसी तरह 8 वर्षों की प्रारम्भिक
शिक्षा पूरी करना लाभदायक है, किन्तु वे सभी युवा जिन्होंने ऐसा किया है, इन सब
कार्यों को सही करने में फिर भी असक्षम हैं। लगभग सभी कार्यों में लड़कियों का
प्रदर्शन लड़कों की तुलना में ख़राब था। यह आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि बहुत से युवा
जिन्होंने 8 वर्षों की शिक्षा पूरी की है उन्हें भी अपने पढ़ने एवं बुनियादी गणित
करने की क्षमता को दैनिक कार्यों में इस्तेमाल करने में कठिनाई होती है।
असर सर्वेक्षण में चयनित प्रत्येक युवा से उनकी
मीडिया, वित्तीय सन्थानों और डिजिटल उपकरणों तक पहुँच को समझने के लिए कई प्रश्न
पूछे गए थे। जैसा कि अनुमानित था, 14-18 आयु वर्ग के युवाओं में मोबाइल फ़ोन का
उपयोग व्यापक है। भोपाल में 68% युवाओं ने पिछले एक
सप्ताह में मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल किया था। परंतु
इन युवाओं का कम्प्यूटर और इन्टरनेट का उपयोग बहुत कम था। पिछले एक सप्ताह में 28% ने इन्टरनेट और 17% युवाओं ने ही
कम्प्यूटर
का उपयोग किया था। लड़कों की तुलना में लड़कियों की कम्प्यूटर एवं इन्टरनेट तक
पहुँच बहुत कम है। भोपाल में 45% लड़कों ने इन्टरनेट का उपयोग कभी नहीं किया, लड़कियों में यह अनुपात 76% है। वित्तीय प्रक्रियाओं एवं संस्थानों में सहभागिता के सन्दर्भ में,
लगभग 77% युवाओं के पास स्वयं का बैंक खाता है एवं 56% युवा ही बैंक में पैसे जमा या निकासी किये हैं। 14%
युवाओं ने ATM या डेबिट
कार्ड का उपयोग किया है, केवल 5% ने किसी पेमेंट ऐप या नेट/मोबाइल
बैंकिंग द्वारा कोइ लेन-देन किया है।
यदि हम यह सुनिश्चित नहीं करेंगे कि इन युवाओं को
वह ज्ञान, कौशल और अवसर प्राप्त हों जिनकी उन्हें स्वयं को एवं अपने परिवार और
समाज को आगे ले जाने के लिए ज़रूरत है, तो भारत अपने प्रतीक्षित ‘डेमोग्राफ़िक
डिविडेंड’ का लाभ नहीं उठा सकेगा। हाल ही के कुछ वर्षों में इस आयु वर्ग के युवाओं
से हमारी बात-चीत से यह पता चलता है कि एक राष्ट्र के रूप में हमें इस आयु वर्ग पर
तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। असर 2017 इसी स्थिति
को प्रकाशित करने का एक प्रयास है। हम आशा करते हैं कि इस पहल से, आगे का रास्ता क्या होना चाहिए, इस विषय पर देश-व्यापक विचार-विमर्श की
शुरुआत हो। आज के बच्चे देश के
भविष्य हैं। शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ छात्र किसी भी देश की पूंजी होते
हैं। बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए सरकारें तमाम तरह की योजनाएं बनाती हैं।
भारत में कोई भी बच्चा(ग्रामीण या शहरी इलाका) शिक्षा हासिल करने के बुनियादी
अधिकार से वंचित न रहे उनके लिए राइट टू एजुकेशन 2009 का प्रावधान किया गया। असर (ASER)
की रिपोर्ट के मुताबिक ग्नामीण इलाकों में स्कूली शिक्षा
का हाल नीति नियामकों के माथे पर चिंता की लकीर खींचता है। देश में शिक्षा का हाल
क्या है इससे समझने से पहले ये जानना जरूरी है कि ग्नामीण इलाकों में छात्रों से
किस तरह के सवाल किये गए थे ।
लेखक : श्याम
कुमार कोलारे ( सामाजिक कार्यकर्त्ता, भोपाल )

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