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लंगडाती शिक्षा गति के भरोसे देश के युवा

आज के बच्चे देश के भविष्य हैं। शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ छात्र किसी भी देश की पूंजी होते हैं। बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए सरकारें तमाम तरह की योजनाएं बनाती हैं। भारत में कोई भी बच्चा(ग्रामीण या शहरी इलाका) शिक्षा हासिल करने के बुनियादी अधिकार से वंचित न रहे उनके लिए राइट टू एजुकेशन 2009 का प्रावधान किया गया। असर (ASER) की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 24 राज्यों के ग्नामीण इलाकों में स्कूली शिक्षा का हाल नीति नियामकों के माथे पर चिंता की लकीर खींचता है। देश में शिक्षा का हाल क्या है इससे समझने से पहले ये जानना जरूरी है कि ग्नामीण इलाकों में छात्रों से किस तरह के सवाल किये गए थे। 

प्रारंभिक शिक्षण स्तर पर लगभग सर्वव्यापक नामांकन और सभी बच्चों को अगली कक्षा में स्वतः प्रवेश मिल मिल जाने का प्रभाव यह रहा है कि अधिक से अधिक बच्चे प्रारंभिक शिक्षण पूरा कर रहे है l DISE के औपचारिक आकड़ों के अनुसार 2004-05 से 2014-15 के दशक में कक्षा 8 में नामांकित बच्चों की संख्या दोगुनी हो गया है l  प्रत्येक 10 भारतीयों में से एक युवा वर्ग में है l यानि इस वर्ग में युवाओं की कुल 10 करोड़ है l इन सभी पहलुओं के कारण 14-18 आयु वर्ग के युवाओं पर ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है l असर 2017 सर्वेक्षण में पढ़ाने तथा गणित करने की बुनियादी क्षमताओं से आगे, अर्थात ‘बियॉन्ड बेसिक्स’ के लिए 4 डोमेन जिसमें गतिविधि, क्षमता,जागरूकता और आकांक्षायें शामिल है l असर 2017 घरों में किया गया सैम्पल आधारित सर्वेक्षण है जिसमे आसानी से पूछे एवं समझे जाने वाले प्रश्न शामिल है l यह स्थानीय सहभागी संस्था के सहयोग से क्रियान्वित किया गया है l यह सर्वेक्षण हमारे देश के लगभग सभी राज्यों के एक या दो जिलों में किया गया है l मध्य प्रदेश में 2 जिलों भोपाल एवं रीवा में सर्वेक्षण में शामिल किया गया है l भोपाल में 60 गाँव में 952 घरों के 1244 युवाओं के सर्वेक्षण में शामिल किया गया है l

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन द्वारा जारी एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) 2017 के अनुसार  प्रदेश की राजधानी भोपाल (ग्रामीण) में 14-18 आयु वर्ग के 69% युवा औपचारिक शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत स्कूल या कॉलेज में नामांकित हैं। 31% युवा अभी भी शिक्षा में नामांकन से दूर हैं । शिक्षा प्रणाली में लड़के और लड़कियों के नामांकन में अंतर आयु के साथ बढ़ता जाता है। 17-18 वर्ष की आयु में भोपाल में 33% लड़कों की तुलना में 48% लड़कियाँ नामांकित नहीं हैं।  कुल मिलाकर, भोपाल में केवल 3% युवा ही वोकेशनल कोर्स (किसी भी प्रकार का) कर रहे हैं। 14-18 आयु वर्ग के युवाओं का 44% एक बड़ा हिस्सा पढ़ाई के साथ परिवार के आर्थिक नियोजन में सहयोग करते है l

बुनियादी पढ़ना, गणित करना एवं अंग्रेज़ी की क्षमता : पिछले 12 वर्षों से, असर के आंकड़े निरंतर इस बात की ओर इशारा करते आए हैं कि प्रारम्भिक स्कूलों में बहुत से बच्चों को पढ़ने और सरल गणित करने जैसी बुनियादी क्षमताएँ प्राप्त करने के लिए तुरंत सहयोग की आवश्यकता है। इस वर्ष 14-18 आयु वर्ग के युवाओं पर ध्यान केन्द्रित किया गया है, इसलिए युवाओं की बुनियादी क्षमताओं के साथ-साथ उनकी बियॉन्ड बेसिक्स, अर्थात बुनियादी क्षमताओं से आगे के कार्यों को करने की क्षमता को भी समझना आवश्यक है।

·         14-18 आयु वर्ग के युवाओं की बुनियादी क्षमताओं की वर्तमान स्थिति का आँकड़ा 37% युवा अभी भी अपनी भाषा में एक सरल पाठ को धाराप्रवाह रूप से नहीं पढ़ सकते। आधे से ज़्यादा (लगभग 67%) युवा भाग का सवाल (तीन अंकों वाली संख्या का एक अंक) से नहीं कर सकते l 40% युवा ही अंग्रेज़ी के सरल वाक्य पढ़ सकते हैं । युवाओं ने प्रारम्भिक शिक्षा के 8 वर्ष पूरे तो क्र लिए हैं, परन्तु एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिनमें अभी भी बुनियादी क्षमताओं - जैसे पढ़ना एवं सरल गणित करना की कमी है । हांलाकि, क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेज़ी में पढ़ने की योग्यता में आयु के साथ सुधार नज़र आता है (14 वर्ष के युवाओं की तुलना में 18 वर्ष के अधिक युवा पढ़ सकते हैं) किन्तु गणित में ऐसा नहीं देखा गया है। बुनियादी गणित करने की क्षमता में असमर्थ 14 वर्ष के युवाओं का प्रतिशत, 18 वर्ष के युवाओं के बराबर ही है। प्रारम्भिक स्तर पर सीखने के आभाव का असर आगे भी नज़र आता है, जब युवा किशोरावस्था से वयस्कता में प्रवेश करते हैं।


दैनिक जीवन में बुनियादी पढ़ने और गणित करने की क्षमता का इस्तेमाल करना
इस आयु वर्ग में सभी से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे कई दैनिक कार्य करने में सक्षम हों, जिनमें बुनियादी पढ़ने और गणित करने की क्षमता की आवश्यकता होती है। एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (असर) 2017 ने 14-18 आयु वर्ग के युवाओं की कुछ ऐसे कार्य करने की क्षमताओं को समझने का प्रयास किया है। दैनिक कार्यों में कुछ सरल गतिविधियों का चयन किया जैसे पैसे गिनना, वज़न जोड़ना और समय बताना शामिल किया गया है l

·         भोपाल ग्रामीण के 63% युवा ही रुपयों की सही गिनती कर पाए । आधे से कम फीसदी युवा किलोग्राम में सही वजन जोड़कर नहीं बता सके । समय बताना एक सामान्य दैनिक कार्य है । 78% युवाओं ने सरल प्रश्न (केवल घंटे बताना) का सही उत्तर दिया। किन्तु थोड़े से कठिन प्रश्न (घंटे और मिनट दोनों बताना) का सही उत्तर में केवल 50% युवा ही दे सके ।

·       क्या युवा ऐसी सामान्य गणनाएँ कर सकते हैं जिनकी आम-तौर पर ज़रुरत पड़ती है? असर 2017 के लिए हमने कुछ ऐसी गतिविधियों का चयन किया - जैसे रूलर की सहायता से लम्बाई मापना, समय की गणना करना, एकाकिक विधि का इस्तेमाल करना (उदाहरण के लिए, यह निर्णय लेना कि पानी को स्वच्छ करने के लिए क्लोरीन की कितनी गोलियों की आवश्यकता है)। भोपाल के 84% युवाओं ने दी गई वस्तु की लम्बाई सही नाप बता पाए, जब वह वस्तु रूलर पर ‘0’ के निशान पर रखी थी। मगर जब वह वस्तु रूलर पर किसी और जगह रखी थी तो केवल 25% ही सही जवाब दे पाए। एकिक नियम आधारित सरल प्रश्न का उत्तर 46% युवाओं ने ही दे पाये ।

·         दैनिक जीवन के कई कार्यों के लिए लिखित निर्देश पढ़कर समझना आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए, पानी की कमी को रोकने के लिए खासकर दस्त लगने की स्थिति में जीवन रक्षक घोल (ओरल रीहाईड्रेशन सोल्यूशन)  के उपाय का सुझाव दिया जाता है। ओ.आर.एस. के पैकेट ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। भोपाल में 44% युवा ही ओ.आर.एस. के पैकेट पर दिए गए निर्देश पढ़कर उस पर आधारित 4 में से कम से कम 3 प्रश्नों का सही उत्तर दे सके।  दैनिक जीवन में व्यावहारिक रूप से उपयोग आने वाली गणना आधारित समय प्रश्नों के सही जबाब ( जैसे दुकान में खरीदारी आधारित) केवल दो-तिहाई से भी कम युवा दे पाए। यह संख्या, कम से कम घटाव करने में सक्षम युवाओं की संख्या से मेल खाती है । छूट की गणना करना आधारित 31% युवा इस अभ्यास को सही करने में सफल थे। वही साधारण ब्याज की गणना कर भुगतान की सही राशी का हिसाब करने में 14% युवा ही सक्षम थे।
·         भूगोल और सामान्य ज्ञान की कितनी जानकारी है आधारित प्रश्नों में सर्वेक्षित युवा को भारत का नक़्शा दिखाया गया। फिर उनसे कई प्रश्न पूछे गए l देश का नक्शा है 81% युवा ही पहचान पायें । देश की राजधानी का नाम 65% युवा ही सही बता पाए l 63% युवाओं ने ही बताया की वह मध्यप्रदेश राज्य में रहते हैं l और मात्र 40% युवा ही नक़्शे पर अपने राज्य को दिखा सके ।

कुल मिलाकर, यह बात सामने आती है कि बुनियादी क्षमताएँ जैसे पढ़ना और गणित करना दैनिक कार्य और सामान्य गणनाएँ करने में सहयोगी हैं। हांलाकि, सभी ऐसे युवा जो पढ़ना एवं बुनियादी गणित करना जानते हैं, इन दैनिक कार्यों को सही तरीके से पूरा नहीं कर पाते हैं। उसी तरह 8 वर्षों की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करना लाभदायक है, किन्तु वे सभी युवा जिन्होंने ऐसा किया है, इन सब कार्यों को सही करने में फिर भी असक्षम हैं। लगभग सभी कार्यों में लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों की तुलना में ख़राब था। यह आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि बहुत से युवा जिन्होंने 8 वर्षों की शिक्षा पूरी की है उन्हें भी अपने पढ़ने एवं बुनियादी गणित करने की क्षमता को दैनिक कार्यों में इस्तेमाल करने में कठिनाई होती है।

जागरूकता और आकांक्षाएँ के बारे में युवाओं की सोच : असर सर्वेक्षण में चयनित प्रत्येक युवा से उनकी मीडिया, वित्तीय सन्थानों और डिजिटल उपकरणों तक पहुँच को समझने के लिए कई प्रश्न पूछे गए थे। जैसा कि अनुमानित था, 14-18 आयु वर्ग के युवाओं में मोबाइल फ़ोन का उपयोग व्यापक है।

·   भोपाल में 68% युवाओं ने पिछले एक सप्ताह में मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल किया था। परंतु इन युवाओं का कम्प्यूटर और इन्टरनेट का उपयोग बहुत कम था। पिछले एक सप्ताह में 28% ने इन्टरनेट और 17युवाओं ने ही कम्प्यूटर का उपयोग किया था। लड़कों की तुलना में लड़कियों की कम्प्यूटर एवं इन्टरनेट तक पहुँच बहुत कम है।  भोपाल में 45% लड़कों ने इन्टरनेट का उपयोग कभी नहीं किया, लड़कियों में यह अनुपात 76% है। वित्तीय प्रक्रियाओं एवं संस्थानों में सहभागिता के सन्दर्भ में, लगभग 77% युवाओं के पास स्वयं का बैंक खाता है एवं 56% युवा ही बैंक में पैसे जमा या निकासी किये हैं। 14% युवाओं ने ATM या डेबिट कार्ड का उपयोग किया है, केवल 5% ने किसी पेमेंट ऐप या नेट/मोबाइल बैंकिंग द्वारा कोइ लेन-देन किया है।
लड़के और लड़कियों की व्यावसायिक आकांक्षाओं में अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। ज़्यादातर लड़के सेना/पुलिस में भर्ती या इंजिनियर बनने की आकांक्षा रखते हैं। इसकी तुलना में लड़कियों ने शिक्षक या नर्स बनने की ओर प्राथमिकता दिखाई।


यदि हम यह सुनिश्चित नहीं करेंगे कि इन युवाओं को वह ज्ञान, कौशल और अवसर प्राप्त हों जिनकी उन्हें स्वयं को एवं अपने परिवार और समाज को आगे ले जाने के लिए ज़रूरत है, तो भारत अपने प्रतीक्षित ‘डेमोग्राफ़िक डिविडेंड’ का लाभ नहीं उठा सकेगा। हाल ही के कुछ वर्षों में इस आयु वर्ग के युवाओं से हमारी बात-चीत से यह पता चलता है कि एक राष्ट्र के रूप में हमें इस आयु वर्ग पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। असर 2017 इसी स्थिति को प्रकाशित करने का एक प्रयास है। हम आशा करते हैं कि इस पहल से, आगे का रास्ता क्या होना चाहिए, इस विषय पर देश-व्यापक विचार-विमर्श की शुरुआत हो।

श्याम कुमार कोलारे 

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