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स्कूली सुविधाओं में तो लगातार सुधार, लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरने के बजाये बिगड़ जा रही है



स्कूली सुविधाओं में तो लगातार सुधार, लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरने के बजाये बिगड़ जा रही है 

एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन की नौवीं रिपोर्ट 2013 हमें बताती है की कैसे शिक्षा का अधिकार कानून मात्र बुनयादी सुविधाओं का कानून साबित हो रहा है। स्कूलों में अधोसंरचना सम्बन्धी सुविधाओं में तो लगातार सुधार हो रहा है लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता सुधरने के बजाये बिगड़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में कक्षा 3 के 43.8% बच्चे कक्षा एक के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे। 2013 में यह अनुपात कम होकर 20.3 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह से 2009 में कक्षा 5 के 50.3 %  बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे 2013 में यह अनुपात घट कर  31.9 प्रतिशत हो गया है।
गणित को लेकर भी हालत बदतर हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 2009 में कक्षा के 36.5% बच्चे कम से कम घटाव कर सकते थे, लिंक 2013 में यह स्तर कम होकर 18.9 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह से 2009 में कक्षा 5 के36.1% बच्चे भाग कर लेते थे जोकि 2013 में घट कर 20.8 प्रतिशत हो गया है।
 ऐसे में सवाल उठाना लाजमी है कि बच्चों को किस तरह का शिक्षा का हक मिल रहा है ? दरअसल असर की ही रिपोर्ट बताती है कि 2013 में भारत के ग्रामीण इलाको में बच्चों के दाखिले प्राइवेट स्कूलों में हुये हैं और पिछले साल के मुकाबले इसमें 7 से 11 प्रतिशत वृद्धि हुई है। ऐसे में राज्य द्वारा निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का सवाल पीछे छूटता नज़र आ रहा है। क्योंकि अब तो देश के ग्रामीण इलाकों में भी प्राइवेट स्कूलों का धंधा बहुत तेजी से अपना पैर पसार रहा है। और तो और देश की 12वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा के दशा सुधरने के लिये पीपीपी (सरकारी निजी सहयोग ) अपनाने की बात की गयी है, जो कि कुछ और नहीं प्राथमिक शिक्षा की पूरी निजी हाथों में सौपने के दिशा में एक और कदम है। ऐसे में शिक्षा अधिकार कानून का क्रियान्वयन और प्राइवेट स्कलों का धंधा एक साथ कैसे चल सकता है?
सीमित मात्रा में ही सही यह कानून सरकार से शिक्षा  के हक मांगने के लिये जनता के हाथ में एक हथियार तो मुहैया कराता ही है। इस अधिनियम के अधीन बच्चों के शिक्षा  के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये राष्ट्रीय व राज्य कमीशन के अतरिक्त अधिकारितायुक्त स्थानीय प्राधिकरण की भी व्यवस्था की गयी है। इसमें स्थानीय निकायों और शाला प्रबन्धन समिति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है, इन स्थानीय निकायों और समुदाय को अपनी भूमिका निभाने के लिये तैयार करने में सामाजिक संस्थाओं/ संगठनों की भी बहुत महती भूमिका बनती है। लेकिन यह असली इलाज नहीं है।
निश्चित रूप से सरकारी शालाओं गुणवत्ता का सवाल सबसे महतवपूर्ण बन चूका है, ऐसे में हमारा अगला लक्ष्य, निजीकरण को रोकना इस कानून में बची खामियों को दूर करते हुये देश के सभी बच्चों को सामान, अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा होना चाहिए।

श्याम कुमार (भोपाल)

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